Towards Infinity : Foreword

Posted On Friday, March 22, 2019 | 5:16:10 PM

Towards Infinity /Anant ki Or अनन्त की ओरः Ram Chandra राम चन्द्र (श्रद्धेय बाबूजी महाराज)

दो शब्द / Foreword


शाहजहाँपुर निवासी श्री राम चन्द्र जी महाराज की कृति ‘अनन्त की ओर’ की यह भूमिका लिखने का आमंत्रण मैंने विनीत भाव से ही स्वीकार किया । जब मैंने पुस्तक की पांडुलिपि पढ़ी तो यह अनुभव किया कि वास्तव में संसार को इस पुस्तक का परिचय देने की पर्याप्त योग्यता मुझमें नहीं है । किन्तु उनकी यह हार्दिक इच्छा थी कि मैं किसी भी स्थिति में यह कार्य करूँ अतः मैंने इसे स्वीकार किया ।
It is with deep feelings of humility that I have accepted the invitation to write this foreword to the work Anant ki Or by Shri Ram Chandra of Shahjahanpur. When I went through the work in manuscript I felt that I was indeed ill-fitted to introduce the work to the world, but since it was his earnest desire that I should however do so, I have accepted this task.
श्री राम चन्द्र जी महाराज मानव जाति के उन श्रेष्ठतम वर्तमान गुरुओं में से एक हैं (यदि उन्हें सर्वश्रेष्ठ कहने में संकोच हो )जो योग्य जिज्ञासु आत्माओं को अत्यन्त पुरातन काल के नितान्त गूढ़ योग मार्ग की शिक्षा दीक्षा उन्मुक्त रूप से प्रदान कर रहे हैं ।
Shri Ram Chandraji Maharaj is one of the foremost, if not the foremost, of living teachers of mankind who has rather unobtrusively been training and teaching the path of recondite yoga of the most ancient times to worthy seeking souls.

उनके श्रेष्ठ सद्गुरु फतेहगढ़ निवासी समर्थ गुरु श्री रामचन्द्र जी ने उन्हें परमपद की ऋजु संप्राप्ति के मार्ग की शिक्षा दी थी, और वास्तव में उन्हें पूर्ण योग की अत्यन्त उत्कृष्ट एवं अन्तिम स्थिति प्रदान की थी ।

His great and worthy Master, Samarth Guru Shri Ram Chandra ji of Fatehgarh had taught him the path of direct achievement of the highest or ultimate state , and had indeed granted him the most sublime and ultimate state if perfected yoga.
इस योग का सबसे महत्वपूर्ण अंग ऐसे गुरु का सर्वोत्कृष्ठ कार्य है, जिसने वह उच्चतम स्थिति प्राप्त कर ली हो जिसे ‘अनन्त ’, ‘असीम ’ अथवा ‘परमपद ’ की संज्ञा प्रदान की जाती है ।
The most important part of this yoga lies in the supreme function of the guru, one who has attained the highest state described as the Ultimate or Anant (Infinite or Endless).

यह दुःख का विषय है कि दार्शनिक लोग ‘असीम ’ की बात तो करते हैं किन्तु उसकी प्राप्ति के प्रयास से विचित्र बौद्धिक पलायनों द्वारा तुरन्त विरत हो जाते हैं, और वेदान्त श्रुति (Text) का उद्धरण देते हैं कि वहाँ से वाणी लौट आती है, मन लौट आता है, इन्द्रियां लौट आती हैं (‘न वाक् गच्छति नौ मनः’अथवा ‘न तत्र सूर्यो भाति न शशाड़्क ’आदि)।

It is a pity that though philosphers do speak of the Infinite, they immediately give up the endeavour to realize It by curious escapisms of intellect quoting the Vedantic text, that from which speech returns, mind returns and senses return, “ Na vak gacchati na mano” or “ Na tatra surya bhaati na sasaankah” and so on.
अवर्णनीय होते हुए भी उसका साक्षातकार उसी परमात्मतत्व की अनुकम्पा द्वारा प्राप्त किया जा सकता है, क्योंकि यह देवाधिदेव अपनी आकृति अपने द्वारा वरण किये हुए व्यक्ति को प्रदर्शित करता है । ( ‘तनुं स्वम् विवृणुत ’ )
Indescribable, it is yet capable of being experienced through the grace of the Ultimate for verily the Divine reveals Its body “ Tanum svaam vivrinute” to the chosen one.

इस योग (राजयोग) के अभ्यास में प्राप्त होने वाले उन अनुभवों की प्रगति का अन्तर्दृष्टि -मूलक विवरण श्री राम चन्द्र जी महाराज ने दिया है, जो आत्मा को विभिन्न स्कन्धों में उत्तरोत्तर उत्क्रमण करने पर प्राप्त होते हैं ।

In the abhyasa of this yoga (Raja Yoga) Shri Ram Chandraji Maharaj gives an inward account of the progress of the experiences as the soul passes from one state to another.
परमतत्व की यह भूमिका अथवा स्कन्ध उसकी प्रत्येक विशेष किरण अथवा आत्मा के लिए सृजनात्मक अवतरण की प्रकिया द्वारा ही निर्मित हो गई है ।
These bhumikas or stages of the Ultimate have indeed been formed for each individual ray or soul through a process of creative descent ,

और इस प्रक्रिया में आत्मा ने जिन अनेक अनुबन्धों अथवा ग्रन्थियों अथवा स्तरों का निर्माण किया उनमें से प्रत्येक के अपने विशिष्ट विधान और रूप विकसित हो गये, जो बन्धन और दुःख का कारण बने ।

and has formed the several knots or granthis or planes, each developing a particular law and form of its own, which has made for the bondage and sorrow.
जिस आत्मा ने इस प्रकार अपने अवतरण का निर्माण किया उसका पुनरावर्तन अर्थात अतिक्रमण के लिए प्रयत्नशील होना अनिवार्य ही है ।
It is inevitable that a soul that has thus formed its descent should attempt to return.

अवतरण के सोपानों (स्कन्धों) की चेतना विस्मृत हो जाने के कारण आत्मा के लिए यही मार्ग अवशिष्ट रह जाता है कि वह किसी ऐसे की खोज करे जिसे न केवल इन सोपानों का ही ज्ञान प्राप्त हो, अपितु जो स्वयं परमपद से आगे पहुँच चुके हों, और दूसरे को योगिक प्राणाहुति (Transmission) द्वारा एक स्कन्ध से दूसरे स्कन्ध तक ले जो सके, क्योंकि किसी ऐसे व्यक्ति के विषय में सदैव गम्भीर सन्देह बना रहेगा जिसने थोड़ी दूर तक उत्क्रमण तो किया हो , किन्तु अस्तित्व के किसी उच्चतर अनुबन्ध (ग्रन्थि) में उलझ गया हो, जो उसे उच्चतर वृत अथवा चक्र में केवल घुमा रहा हो , भले ही वह वृत अथवा चक्र हमारी मानवीय स्थिति से कितना ही आगे हो ।

The awareness of the steps of the descent having been forgotten, it remains for it to seek one who not only knows the steps but has gone beyond to the Ultimate and can lead one up through yogic transmission from stage to stage, for there is always the serious doubt about anyone who hath ascended but little, and has been caught up in some higher knot of being that is but rotating him in that higher circle or wheel however much beyond our human state.
श्री राम चन्द्र जी की सूक्षम एवं सुस्पष्ट दृष्टि यह बतलाती है कि इन अनुबन्धों (ग्रन्थियों) के वास्तविक स्वरूप को समझ कर उनका अवशेष विलयन (Dissolution)एवं उसके उच्चतर प्रकार की सारूप्यता और सायुज्यता प्राप्त करके उन ग्रन्थियों का अविलम्ब अतिक्रमण किया जाना चाहिए ।
The acute and clear vivion of Shri Ram Chandraji shows that these knots are at once to be understood in their true nature and dissolved ( laya ) and a higher form ( sarupyata), recovered and integrated ( sayujyata ) and transcended.

इन अनुबन्धों (ग्रन्थियों) अथवा अस्तित्व के वृतों के अतिक्रमण की विधि, और जिस आनन्द ने पहले अवतरण का निर्माण किया था और अब उतक्रमण में सहायक हो रहा है , उसके विभिन्न प्रकार की अनुभूतियों के वर्णन की मौलिकता सर्वथा नवीन पद्धति प्रस्तुत करती है , जिससे अब तक का दुष्प्राप्य योग साहित्य नितान्त अपरिचित रहा है ।

The originality of these descriptions and the method of transcendence of these knots or circles of being and the experiences of the different kinds of ananda that had made for the descent, and now makes for the ascent, reveals a new technique unknown to earlier extant yoga literature.
कई उपनिषदों में भूमिकाओं (सप्त-भूमिकाओं) एवं अनुबन्धों के वर्णन तो मिलते हैं, किन्तु उनके स्वरूप, अस्तित्व एवं ज्ञान की स्थिति की मनोवैज्ञानिक उत्पत्ति कहीं नहीं पाई जाती।
We do have descriptions of bhumikas (sapta-bhumikas) and granthis in some of the Upanishads, but we never come across the psychological proof of their nature and being and status of jnaana.

श्री राम चन्द्र जी ने तेरह ग्रन्थियों का विवरण देकर उन पर अद्भुत प्रकाश डाला है ।

Shri Ram Chandraji gives us an account of the thirteen granthis and throws wonderful light on them.
उनका उच्छेदन नहीं किन्तु उन्मूलन करके अतिक्रमण किया जाना चाहिए।
They are not be cut but loosened and transcended.

वह सभी से आगे पहुँच कर अस्तित्व के ऐसे उच्चतर स्तर दिखलाते हैं, जो समस्त ज्ञान- भूमिकाओं का अतिक्रमण कर चुकने पर उन सर्वोत्कृष्ट सर्वातीत स्थितियों तक उत्पन्न होते हैं,जो केवल मानव के लिए प्रशस्त है ।

Going farther than any , he shows higher levels of being which transcend the jnaana-bhumikas and arise at the supreme transcendentstates which are open to the human being.
किन्तु उन स्तरों पर मनुष्य की आत्मा उन सबका अतिक्रमण कर जायेगी जिसके लिए ‘मानवीय ’विशेषण का प्रयोग हो सकता है, और अन्तिम अस्तित्व को प्राप्त हो जायेगी।
But at that stage the human soul would have passed beyond anything that we call human and arrive at the Ultimate Being.

जिन स्कन्धों तक ऐतिहासिक -महत्व प्राप्त कुछ श्रेष्ठतम - शक्ति - सम्पन्न सन्त और ऋषि अपने जीवन में पहुँचे थे , उनका पर्यावलोकन ध्यान (Meditation) के द्वारा उपलब्ध समुचित ज्ञान के माध्यम से किया जा सकता है ।

In and through the proper understanding through meditation (abhyasa) one can discern the stages at which some the mightiest saints and sages of history had arrived during their lived ,
और इस प्रकार अपने अन्तर में ही उस आनन्द का सत्यापन किया जा सकता है, जिसे इसकी प्रतीक्षा है कि कोई उसका अन्वेषण करके उसमें प्रविष्ट हो।
and verify in oneself the blessedness that is waiting to be explored and entered into by one.

इस पुस्तक में हम एक ऐसे सर्वोत्कृष्ट सद्गुरु की प्रमाणिक वाणी का पर्यावलोकन करते हैं, जिनका मानव कि प्रति प्रेम उस सभी का अतिक्रमण करता है जो किसी को ज्ञात है ।

Here we discern the authentic voice of a supreme Master, whose love for man transcends anything that one knows of.
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Posted By : vishnukumar  |  Total views : 149