Way to Realisation (Role of the Abhyasi ) - Non-attachment..........Sahaj Marg Philosophy..by Ram Chandra (Rev.Babuji)

Posted On Thursday, December 1, 2016 | 4:33:36 PM

साक्षातकार का मार्ग

(अभ्यासी की भूमिका ) -    वैराग्य                     

Way to Realisation

(Role of the Abhyasi )  -           Non-attachment

 

यह सत्य है कि यदि हम वैराग्य न पैदा करें तो

माया से कभी मुक्त नहीं हो सकते ।

परन्तु इसका  तात्पर्य यह नहीं है कि हम अपने घर , परिवार और अन्य सांसारिक सम्बन्धों से सम्बन्ध विच्छेद कर एक धार्मिक भिक्षुक का जीवन अपना लें । 

नि:सन्देह हमें एक गृहस्थ के रूप में बहुत सी बातों पर ध्यान देना होता है ।

हमें अपने परिवार का पोषण करना होता है। हमें अपने बच्चों की शिक्षा का प्रबन्ध करना होता है ।

हमें उनकी आवश्यकताओं पर ध्यान देना होता है , हमें उन्हें शीत- ताप से बचाना होता है , इत्यादि ।

इन आवश्यकताओं के लिए हम कमाते और धन- सम्पति रखते हैं ।

वास्तविक बुराई तो अपने से सम्बन्धित वस्तुओं से अनावश्यक राग ही है ।

यही हमारे दु:ख का मुख्य कारण है ।

परन्तु यदि हम इस योग्य हो सकें कि हर कार्य अपना कर्तव्य समझकर बिना किसी आकर्षण -विकर्षण के कर सकें तो हम एक प्रकार से सांसारिक बन्धनों से मुक्त हैं और संसार का हमने वास्तविक अर्थ में त्याग कर दिया है । 

हाँलाकि हम बहुत सी चीजें रखते हैं तथा उनका उपयोग करते हैं ।

तब हमारी हर वस्तु , हमें सोंपे गए कर्तव्यों के करने के लिए , ईश्वर की पवित्र धरोहर मालूम पडे़गी ।

त्याग , वास्तव में सांसारिक वस्तुओं के प्रति वैराग्य की भावना है न कि उनका असंचियकरण ।

इस प्रकार  गृहस्थ जीवन , जिसमें सांसारिक सम्बन्धों एवम्  वस्तुओं का रखना अनिवार्य  है , त्याग तथा साक्षातकार के मार्ग में कोई अवरोध नहीं है ।

परन्तु तभी  जब व्यक्ति अपने से सम्बन्धित वस्तुओं से अनावश्यक रूप से चिपका न हो ।

संतों  के ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं जिन्होंने उच्चतम कोटि की पूर्णता सारे जीवन गृहस्थाश्रम में रह कर प्राप्त किया है ।

त्याग,  , वास्तव में मन की एक आंतरिक अवस्था है  जो वस्तुओं के क्षणिक और परिवर्तनशील स्वभाव को उजागर करती है तथा ऐसी वस्तुओं से वैराग्य की भावना  पैदा करती है । 

उसकी दृष्टि प्रतिक्षण वास्तविकता पर टिकी रहती है जो अपरिवर्तनशील और अक्षर है । और, वह आकर्षण -विकर्षण की भावना से मुक्त रहता है ।  

वैराग्य का यही वास्तविक अर्थ है ।

It is true that we can never be free from Maya

unless we cultivate non-attachment.

But it does not mean severing our connection from home, family and all worldly concerns and taking up the life of a religious mendicant .

No doubt, as a house holder we have to look after many things ; we have to support our family ; we have to provide for the education of our children ; we have to look to their wants and necessities; we have to protect them from heat and cold ; and so on .

For these necessities we earn and possess money and property .

The real evil is only our undue attachment to the things which we are associated with.

This is the main cause of our suffering.

But  if we are able to do every thing in life thinking it to be our duty without any feeling of attraction or repulsion, we are in a way free from worldly ties and have renounced the world in true sense, although we possess and make many things.

Everything we possess shall then seem to be a sacred trust from the Supreme Master , for the discharge of the duties entrusted to us .

Renunciation truly means non-attachment  with worldly objects and not the non-possession of things.

Thus a house-holder's life in which possession  of things and worldly ties are indispensable is no impediment in the way of  renunciation  and consequently of realisation, only if one is not unduly attached to the objects he is connected with.

There are numerous examples of  Saints having attained the highest degree of perfection leading a house holder's life all through.

Renunciation is in fact a condition or an inner state of mind which brings to view the transitory and changing character of things and creates a feeling of non-attachment    to such objects.

His eyes are fixed every moment  on Reality which is unchanging and eternal and he is free from the feeling of attraction and repulsion.

This is VAIRAGYA ( Renunciation) in the true sense of the term.

 

जब हमारे मन की यह अवस्था हो जाती है तो हम इच्छाओं से छुटकारा पा जाते हैं । जो कुछ भी हमें मिल जाता है हम उसी से संतुष्ट रहते हैं ।

इच्छाओं का अन्त होने का अर्थ संस्कारों के निर्माण का बन्द हो जाना है ।

इसके बाद जो बचा रहता है  वह पूर्वकृत संस्कारों का केवल भोग है जिन्हें अपने जीवन में समाप्त करना होता है । प्रकृति भी इस प्रक्रिया भोग के लिए क्षेत्र बनाकर हमारी सहायता करती है जिससे हमारे कारण शरीर पर से हमारे विचारों  और कार्यों  के भोग  ( संस्कार ) मिट सकें । जब यह आवरण पिघल जाते हैं तो हम अस्तित्व के सूक्षम रूपों को धारण करने लगते हैं।

When we have achieved this state of mind , we are free from desires.

We feel contended with what is available to us.

The end of desire means stopping of the formation of Sanskaras.

What remains now is only to undergo the effect  ( Bhog)  of the previously formed Sanskaras ( impressions)  which are to be worn out during the course of our life.

Nature too  helps us in the process by creating a field for Bhog in order to remove the impressions of our thoughts  and  actions from the causal body . When these coverings melt away we begin to assume finer forms of existence.

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