" SAHAJ- MARGA", Year -1,Number-1. of October,1956.-Shubh Sandesh-by Rev.Babuji Maharajji

Posted On Saturday, November 5, 2016 | 9:10:21 PM

शुभ- सन्देश
लेखक-ः श्री राम चन्द्र जी महाराज
            साधारणतः लोगों में यही विचार फैला हुआ कि केवल क्रिया ही जो हमें बतलाई
 जाती है ,वह स्वयं पूर्णदशा पर पहुँचने के लिए यथेष्ट है । इसके अतिरिक्त उनका
विचार दौड़ता ही नहीं । यदि हम अपनी नींव , जिस पर हमें आध्यात्मिकता का भवन बनाना
 है , राजयोग बतलाते हैं , और वास्तव में है भी , तो सम्भव है कि लोगों का विचार
इसकी तह तक न पहुँचता हो और केवल नियमों के पालन तक ही उनकी दृष्टि रहती हो ।
यह अवश्य है कि मेरे साथ  (Transmission) प्राण-आहुति को भी हवा लगती रहती है ।
परन्तु फिर भी एक वस्तु जो शेष रह जाती है, वह है प्रेम और भक्ति ।
क्रिया ( अर्थात  ध्यान) के साथ यह चीज चलना आवश्यक है ।
श्री कृष्ण जी महाराज ने राजयोग में इस चीज को भी सम्मिलित किया था, जिससे शीघ्रता
 हो जावे और साधक अपने लक्ष्य पर शीघ्र ही पहुँच सके । किन्तु इन बातों को अपने में
 उत्पन्न करना आप का काम है। उपाय यह अवश्य है कि ईश्वर का सतत् स्मरण  रखने का
 प्रयत्न किया जावे । इसमें लोग यह एतराज कर सकते हैंकि मानव - मस्तिष्क प्रति समय
 एक ही ओर लगा हुआ नहीं रह सकता है, इसलिए कि मस्तिष्क इतना थक जायेगा कि
 कदाचित वह इसे एकाध दिन ही स्थायी रख सकता है । मैं साधारणतया लोगों में यही
शिकायत देखकर कुछ आवश्यक बातें लिख रहा हूँ ।
जो भी कार्य आप करते हैं , उसको यह समझ कर करें कि ईश्वर की आज्ञा है, इसलिये
मेरा कर्तव्य है, तो स्मरण की दशा अवश्य बनी रहने लगेगी तथा इसका एक लाभ यह
होगा कि संस्कार बनना बिल्कुल बन्द हो जायेंगे। हर समय स्मरण रखने से ईश्वर में
लगाव भी उत्पन्न हो जाता है और भाई क्योंकि हमारे विचार में गर्मी उपस्थित है ,
इसलिए कुछ उभार की दशा (अर्थात प्रेम के उभार की )उत्पन्न होने लगती है , तथा
धीरे-धीरे इसी के द्वारा भक्ति का पूर्ण रूप आ जाता है । जरा लोग इसकी आदत
डालकर तो देखें , फिर देखिए कि प्रेम उत्पन्न होता है कि नहीं । यह वस्तु तो नितान्त
आवश्यक है ।
दूसरी , सदाचार की बात , जो अत्यन्त आवश्यक है, वह यह कि हम कोई कर्म ऐसा
न करें कि जिससे लोग उंगली  उठाएँ । हमारे दैनिक जीवन के नियम तथा सबके
साथ व्यवहार बहुत ही भला एवं सीधा-सादा होना चाहिए । इससे आपके मन को भी
सन्तोष मिलेगा और शान्ति की अवस्था का आरम्भ स्वयं ही आपके अन्तर में प्रस्फुटित
होने लगेगा ।
एक भाई ने मुझसे पूछा था कि जब लोग प्रेम करना नहीं सीखते , तो अभ्यास के नियम
(method )में कोई ऐसा संशोधन होना चाहिए , जिससे यह बात सिद्ध हो सके ।
सोचते-सोचते ईश्वर ने मेरी सहायता की और यह बात भी मेरी समझ में आ गई ।
चुनाँचे जो अभ्यास आप कर रहे हैं , उसमें थोड़ा सा संशोधन कर दिया गया । मैंने
लोगों को दो एक अभ्यास बतलाये हैं। जो उसमें यह चीज पैदा कर लें कि जिसका
ध्यान मैं कर रहा हूँ , वह ( अर्थात ईश्वर) मुझको अपनी ओर आकर्षित (खींच) कर रहा है।
अर्थात जो लोग ईश्वर की ज्योति का ध्यान हृदय में ( जैसा कि मैंने उन्हें बतलाया है)
करते हैं , वह ध्यान करते समय इस बात पर भी ध्यान लगा दें कि ईश्वर का प्रकाश जो
हृदय में उपस्थित है, वह मुझे अपनी ओर आकर्षित ( खींच) कर रहा है । फिर आप लोग देखें
कि भक्ति व प्रेम कैसे उत्पन्न नहीं होता है।
हाँ , इतनी बात अवश्य है , और इतना मैं अवश्य कहूँगा कि लगाव उत्पन्न करना आपको भी
चाहिये, इसलिये कि यदिआप लोग यह बात नहीं करते , तो सेवक (बन्दगी) का कर्तव्य , जो
आप पर आवश्यक है, आप पूर्ण नहीं करते  और फकीरी ( साधुता ) या मनुष्यता इसी में है
कि कर्तव्य पालन पूर्ण हो जाय । वह मनुष्य , मनुष्य ही नहीं, जिसकी दृष्टि अपनी ओर
नहीं जाती तथा वास्तवित खोज इसी में है कि हमारी दृष्टि हर समय अपनी ही ओर रहे और
यह वस्तु हमको धुर से मिली है । यदि इसी बात का नियम अभ्यासी करले ( अर्थात दृष्टि को
आन्तरिक करते जावे ) तो आप की स्थिति वहीं पर होगी , जहाँ से कि यह वस्तु हमें मिली
है अर्थात हम मूल भण्डार  ( असल भण्डार ) में अपना एक चिन्ह स्थित कर देते हैं ।
फिर हमें केवलअपने विस्तार का रूप उत्पन्न करना शेष रह जाता है ।
अब विस्तार का रूप कैसे पैदा करें ?
इसके लिये यही अभ्यास , जो मैंने बताया है , उसका एक अंग है ( अर्थात ईश्वर- ध्यान
के साथ अंतर्मुखी रहने का प्रयत्न भी करें ) ।  इतनी सरल बातें मैं बताता हूँ, जिनका
करना मनुष्य के लिये ( गृहस्थी के साथ सभी ) बहुत ही सरल है, यदि उनमें ईश्वर-प्राप्ति
की तड़प हो । ईश्वर कहीं लोगों में सच्ची तड़प उत्पन्न कर दे और ईश्वर करे ऐसा हो ,
तो फिर काम बनते देर नहीं लगती ।
लोगों को शान्ति की खोज है तो भला इस बेचैनी ( तड़प ) के लिये कौन तैयार हो ?
मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि जो आनन्द इस बेचैनी ( अर्थात ईश्वरीय स्मरण ) में
है, वह शान्ति मे नहीं मिलता । जिसको लोग शान्ति कहते हैं , वास्तव में मेरी समझ
में वह कमाल ( परिपक् वता ) की चीज है, जिका तलछट अभ्यास में कुछ अवश्य मिल जाता है।
और जो इस बात का प्रमाण देता है कि उसका कोई मुख्य बिन्दु (centre )अवश्य है ।
बेचैनी बढ़ते-बढ़ते अर्थात जब यह बेचैनी कमाल ( सीमा ) पर पहुँचती है और सीमा को पार
कर लेती है , तब शान्ति (वास्तविक ) का आरम्भ होता है।
उससे आगे अभी लिखना बेकार है । लिखने का अर्थ केवल यही है कि लोग 'उससे' ( ईश्वर से )
मिलने के लिये बेचैन रहें और इसीसे मुझे भी शान्ति मिलेगी । यदि आप लोग अपना यह
कर्तव्य समझते हैं कि जो कुछ भी सेवा मैं लोगों की कर रहा हूँ, उसके बदले में मुझे
शान्ति मिले तो यही उपाय हो सकता हैकि आप लोग भी बेचैन रहें । **********
लेखक: श्री राम चंद्र जी महाराज---अर्थात पूज्य बाबूजी
* "सहज मार्ग"  वर्ष एक , अंक एक से उद्धृत ***अक्टूबर १९५६ /
उत्तिष्ठत जागृत प्राप्य वरान्निबोधत ।
अर्थ ः उठो । जागो । जब तक ध्येय प्राप्त न हो जाय, मत रूको ।।
 " SAHAJ- MARGA", Year -1,Number-1. of October,1956.

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