Excerpts from' Rev.Babuji's Message

Posted On Friday, September 30, 2016 | 4:11:33 PM



"पूज्य बाबूजी के सन्देश"
नामक पुस्तक  से अंश
"जिसने अपना शीशये दिल साफ कर लिया , उसको उस खटक का एहसास होता है , जो ईश्वरीय मंडल में होती है ।
ऐसा ही शख्स अभ्यासी के दिल को साफ़ करके उसमें रोशनी डाल सकता है ।
जो शख्स गुरु बनकर मैदान में तालीम देने आता है ,
तो उसका मतलब यह हुआ कि वह ईश्वर का रुतबा अख्तियार करना चाहता है ,
क्योंकि ईश्वर ही सबका गुरु है ।
जाहिर है कि एक मुल्क में दो बादशाह नहीं रह सकते ।
इसका नतीजा यह है कि जो शख्स गुरु बनकर तालीम देता है ,
वह सही माइनों में फायदा नहीं पहुँचा सकता ।
इसलिए लाजिम है कि वह अपने को एक तुच्छ भाई समझे ,
और ऐसा ही व्यवहार अमल में लावे ।
इस तरह की बिरादराना खिदमत के लिए किसी ज़द्दो ज़़हद की दरकार नहीं ,
बल्कि इस पाये पर पहुँच कर मुआल्लिम से
तालीम की खिदमत खुद-ब-खुद रवाँ होती है, जैसे कि सूरज से रोशनी और गर्मी ।"
आमीन ।
Extracted from the Book :" Pujya Babuji ke Sandesh"(Page-1)
Translation:
“The one who has cleansed his mirror like heart, does have the realisation of that trickle which happens in the Godly Region. Such a person only can cleanse abhyasi’s heart and infuse light into that. The person who comes as guru in the field to impart education, then it means that he wants to acquire the status of God because God alone is the Master for all. It is clear that in one country two kings cannot co-exist.
The consequence of this is that the person who as Master imparts education, he in reality cannot bestow benefit. For this reason imperative it is that he considers self as an insignificant being and accordingly behaves as such in practise. For such social service no need for struggle, but on reaching that state from the godly figure the education automatically flows, like from the Sun, light and heat.”
Amin.

स्रोत -"पूज्य बाबूजी के सन्देश " पुस्तक (पृष्ठ-1)
Translation by Shri S.C.Kishore ,
The Society for Babuji's Mission, Delhi.









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