पृष्ठ -१ से आगे पढ़िये -संदेश १९७९ बसंतोत्सव समर्थ सद् गुरू श्री राम चंद्र जी महाराज , शाहजहाँपुर, (उ०प्र०)

Posted On Tuesday, September 13, 2016 | 2:23:08 PM

संदेश १९७९ बसंतोत्सव
समर्थ सद् गुरू श्री राम चंद्र जी महाराज , शाहजहाँपुर, (उ०प्र०)
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...और भला उनको क्या चाहिए था ? आये और खूब काम किया और बाद के लिए बबा ?(संक्रामक रोग)फैला गये कि अपना नाम कायम कर गये।
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कितनी अच्छी बात है , दुनियावी तालीम ( सांसारिक शिक्षा) के लिये हज़ारों रूपये खर्च किये जाते हैं , गिरोहबंदी (गुटबंदी) के लिये कितनी खूं -रे जी (रक्त-पात ) होती है ! ठकुरायत  कायम रखने के लिए कितना जुल्म किया जाता है ! अपनी बड़ाई के लिये कितना खर्च होता है !
अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिये कितनी बातें ऐसी की जाती हैं वो भी  अनुचित !
कितनी दावतें दी जाती हैं !  कितने के पैर धोये जाते हैं ! 
अब सोचो तो सही कितना परिश्रम अपनी इज्जत  अपनी आबरू बढ़ाने के लिये किया जाता है । कितना वक्त लगता है और कितना रूपया !
यह कितनी मुश्किल बात है और इस दौड़- धूप में बड़ा हिस्सा जिंदगी का गुजर जाता है और फिर भी अक्सर उतनी कामयाबी नहीं होती जितने का ख्याल था और उस में भी तरह-तरह के खतरे , तरह-तरह के नुकसान , तरह-तरह की मुसीबतें ;
इससे तो यही बेहतर  है कि गुरूआई ऐसे तरीके शुरू कर दें जैसा कि आजकल लोग करते हैं । किसी ने कान फूंक दिया , किसी ने हाथ पर हाथ मारा ।
इससे ताल्लुक नहीं कि उसका आध्यात्मिक सम्बंध भी दुरूस्त हुआ या अपने आप में भी ऐसी काबलियत है या नहीं । मतलब से मतलब , गुरूआई से गरज़ , हलवे-मांडे़से काम , अपनी जरूरियात ( आवश्यकताओं) की फिक्र । यह तो बहुत सहल में ही गुरू बन गये  और हर नुकसान से बच भी गये ।
भाई यह तो बड़ाअच्छा मामला है और मैं समझता हूँ  यह सबको करना चाहिए । मगर क्या आकिवत बख्श दी गई ( परमार्थ प्राप्त हो गया ) ? हर्गिज़ नहीं ! गहरी खाई तैयार है ।
सबसे पहले ऐसा व्यक्ति उस में जाने वाला होगा । खुदा की रहमत कभी उस पर नाज़िल न होगी (वह  ईश्वर की कृपा का कभी पात्र न होगा )
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क्या ईश्वर के नाम पर ऐसे लोगो ने धोखा नहीं दिया ?
क्या वह ऐसा धोखा है जो माफ किया जा सकता है? हर्गिज़ नहीं !  आकिवत कैसी जब उसकी शुरूआत ही खराब , रूहानियत कैसी जबकि आरम्भ में ही अपने स्वार्थों के लिए लोभ का आंचल पकड़ लिया ?
क्या यह लोग सच्चे अर्थों में कह सकते हैं कि उन्होंने  मेरा ( समर्थ सद् गुरू ) आसरा लिया ? 
अगर ऐसा होता तो यह बातें कभी न होती । क्या यह शराफत नहीं है  कि अपनी कमजोरियों  को किसी ऐसे व्यक्ति  के सामने रख दें जिसको उन्हें दूर करने की योग्यता प्राप्त हो ।
ऐसा क्यों नहीं करते ?
शर्म हया की वज़ह से कि ऐसा न हो कि हमारा दोष ऐसे व्यक्ति को समझ में आ जाय कि उनकी भद्द हो जाय ।
और शागिर्दों (शिष्यों) का दिमाग तो पहले ही से बंद कर रखा है कि गुरू से आगे कुछ सोचे ही नहीं ; जब सोचेंगे  नहीं , तो समझ में क्यों आने लगा । क्या अच्छा हाल है खुदा बचाये !
अहा! हा! क्या अच्छ मजमून है हमको तो इसकी नकल करना चाहिये । इससे दुनिया तो मिलती ही है अखिरत कौन देखता है ? यह तो खुदा ही को  मालूम होती है। ये चीज़ तो सम्भल ही जायेगी दूसरों से हमें  गरज़ क्या ? उसके मालिक तो गुरू महाराज हैं  सब ठीक  कर लेंगे ,भाइयो ! यह बात बहुत अच्छी कही है । अगर  मैं इस काबिल होता तो भला गुरू क्यों करता ! कुछ उनकी भी तो जिम्मेदारी हैं , यह सब काम हम ही कर लेंगे । अखिरत के  ठेकेदार तो वह हैं  , हमें उससे मतलब क्या ? वह करे या न करे यह उनका कर्म है । बरहाल वह करेंगे यह तो मुझे विश्वास है , क्योंकि इसके जिम्मेदार तो वह हैं । अगर न किया तो क्या उनसे जवाब नहीं लिया जायेगा ? जरूर , वह भी उससे बच नहीं सकते , ईश्वर तो दोनो का है , फिर कैसे हो सकता है कि इंसाफ न करे और एक दूसरे उसके कर्म का जवाब न ले  और अगर यह  नहीं करता जो मुझे तो भई उसके अस्तित्व से संदेह हो गया । क्या ऐसि उम्मीद है कि वह अपना कर्तव्य पूरा न करे । अरे, यह तो रोज़ की बातें हैं । एक बार ..........
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मैं कचहरी से आ रहा था दो गधे लड़ते हुए पीछे से आये । मैं चूंकि ध्यान की स्थिति में था , अल्लाह मियां को यह फिक्र पैदा हुई कि ऐसा न हो कि यह दब जाय और फिर कोई बंदगी ( सेवकाई ) करने वाला न रहे !
फिर क्या था ,फरिश्ते को हुक्म दिया कि तुरंत इन गधों को अलग कर दो , ऐसा न हो कि यह शख्स जख्मी हो जाये । फौरन आज्ञा का पालन किया गया और गधों को अलग कर दिया गया ।
 एक मिसाल तो मैं यह ही पेश करता हूँ और जाने कितनी गुजरी होंगी ,कहां तक कहूँ !
आखिर को यह यकीन हो गया कि खुदा करता है और जाहिर कि जब गधों को अलग करने में उसने मदद की तो क्या एक इन्सान की मदद नहीं करेगा ?
और कैसा इन्सान , जो गुरू के हाथ पर तबली ठोक चुका है और हाथ पर हाथ रख चुका है !
क्या यह बातें पाये सबूत ( प्रमाण के दर्जे पर ) नहीं पहुँचती कि हाथ पकङना कोई मजाक नहीं है, उम्र भर निभाना होता है । और गुरू जो हाथ पकङे, उसको तो उम्र भर के बाद भी निभाना होगा ।
इसलिए वह तो गुरू है , भव सागरपार उतारने वाले हैं ।
कोई मजाक थोङे ही हैं,जो इससे निकल जाय । वह तो हमारे हो चुके और इसकी कीमत भी पा चुके । इसलिए कि दीक्षा ग्रहण करते समय मैंने नजर भी तो दी थी ।
अब भला पूछो तो सही कि गुरूने टका भी पाया , सुपुर्दगी (समर्पण ) भी ली और हाथ भी पकङा ।
फिर ख्याल कैसे न पैदा हो कि हमारीवह मदद नहीं करेंगे ?
हमें अब क्या चाहिए : इससे सस्ता गुरू भला किसी को मिल सकता है । हर्गिज नहीं ।
अब क्या है , भाई इस काबिल बनो कि यह तरीका अपना सको जो मैंने अपने गुरूके साथ कियाथा ।
इससे दुनिया और आखिरत ( संसार और परमार्थ ) दोनो संभल जाते हैं और करने को तो कुछ बाकी ही नहीं रह जाता ।
इसलिए कि गुरू करे भी और फिर भी कुछ करने को रह जाय तो फिर भला ऐसे योग्य गुरूको करने से
प्रष्ठ-५
क्या फायदा ?.................क्रमश:  ..

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